छत्तीसगढ़ प्रदेश विद्यालयीन शिक्षक संघ ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र — शिक्षा आयोग में अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति की मांग तेज

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छत्तीसगढ़ प्रदेश विद्यालयीन शिक्षक संघ ने प्रधानमंत्री को लिखा पत्र — शिक्षा आयोग में अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति की मांग तेज

रायपुर, 3 नवम्बर 2025।
छत्तीसगढ़ प्रदेश विद्यालयीन शिक्षक संघ, पंजीयन क्रमांक 122202545569, ने प्रदेश के शिक्षा क्षेत्र से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी को पत्र लिखा है। इस पत्र में संघ ने राज्य में शिक्षा आयोग तथा संस्कृत मंडलम में अध्यक्ष और सदस्यों की शीघ्र नियुक्ति की मांग की है।

संघ के प्रदेश अध्यक्ष धरमदास बंजारे, प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद प्रेमी, प्रदेश सचिव अमित कुमार बंजारे, तथा प्रदेश मीडिया प्रभारी कमल नारायण चौहान ने इस संबंध में एक संयुक्त प्रेस विज्ञप्ति जारी की।  जिला अध्यक्ष जशपुर मुकेश कुमार ने बताया कि पिछले आठ वर्षों से छत्तीसगढ़ राज्य शिक्षा आयोग निष्क्रिय स्थिति में है, जिससे न केवल नीति-निर्माण में ठहराव आया है बल्कि प्रदेश के लाखों विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति भी बाधित हुई है।


शिक्षा आयोग की स्थापना का उद्देश्य और वर्तमान स्थिति

छत्तीसगढ़ राज्य शिक्षा आयोग का गठन वर्ष 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री के कार्यकाल में किया गया था। इसका उद्देश्य था—
राज्य के संदर्भ में शिक्षा की गुणवत्ता को सुदृढ़ करना, स्थानीय भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देना, शिक्षक प्रशिक्षण को सुदृढ़ करना, तथा राज्य की शैक्षणिक नीतियों को राष्ट्रीय नीति से समन्वित करना।

शिक्षा आयोग के गठन से अपेक्षा थी कि यह निकाय प्रदेश में स्कूली पाठ्यक्रम के निर्माण, शैक्षिक नवाचार, शिक्षक प्रशिक्षण, पुस्तक लेखन, और छत्तीसगढ़ी भाषा को पाठ्यक्रम में शामिल करने जैसे कार्यों में गहराई से योगदान देगा।

लेकिन वर्ष 2017 के बाद से आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति न होने के कारण आयोग निष्क्रिय हो गया। इससे शिक्षा के क्षेत्र में अनेक योजनाएं अधूरी रह गईं और नीतिगत स्तर पर राज्य पिछड़ता चला गया।

प्रदेश विद्यालयीन शिक्षक संघ के अनुसार, यदि शिक्षा आयोग सक्रिय होता तो राज्य में

  • छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति पर आधारित स्थानीय अध्ययन सामग्री तैयार होती,
  • शिक्षक प्रशिक्षण के नए मॉडल विकसित किए जा सकते थे,
  • और शिक्षा में राष्ट्रीय चरित्र निर्माण और नवाचार की दिशा में बड़ा कदम उठाया जा सकता था।

प्रधानमंत्री को लिखे पत्र की मुख्य बातें

संघ द्वारा भेजे गए पत्र में प्रधानमंत्री से आग्रह किया गया है कि छत्तीसगढ़ में शिक्षा आयोग और संस्कृत मंडलम की नियुक्तियों को शीघ्र बहाल किया जाए।
पत्र में यह भी कहा गया है कि राज्य में शिक्षा आयोग की अनुपस्थिति से नीति-निर्माण, शिक्षक प्रशिक्षण, और नई शिक्षा नीति (NEP 2020) के कार्यान्वयन में कठिनाई आ रही है।

पत्र में निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं को रेखांकित किया गया है –

  1. आयोग की नियुक्तियां तत्काल की जाएं, ताकि राज्य में शिक्षा से जुड़ी ठोस नीतियां बन सकें।
  2. शिक्षा के विविध स्तरों (प्राथमिक, माध्यमिक, उच्चतर माध्यमिक, और उच्च शिक्षा) के लिए एकीकृत रणनीति तैयार की जाए।
  3. शिक्षक कल्याण और प्रशिक्षण की नई नीतियां राज्य के परिप्रेक्ष्य में लागू की जाएं।
  4. संस्कृत मंडलम में भी नई नियुक्तियां की जाएं, जिससे पारंपरिक भारतीय ज्ञान प्रणाली को प्रोत्साहन मिल सके।
  5. आयोग में शिक्षाविदों, शिक्षकों, और विषय विशेषज्ञों को शामिल किया जाए, जो छत्तीसगढ़ के शैक्षणिक संदर्भ को भली-भांति समझते हों।

प्रदेश अध्यक्ष धरमदास बंजारे का बयान

संघ के प्रदेश अध्यक्ष धरमदास बंजारे ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा —

“विगत आठ वर्षों से छत्तीसगढ़ में शिक्षा आयोग में न तो अध्यक्ष की नियुक्ति हुई है और न ही सदस्यों की। इसका परिणाम यह हुआ है कि राज्य की शिक्षा व्यवस्था नीतिगत दृष्टि से ठहराव की स्थिति में है। यदि आयोग सक्रिय होता, तो छत्तीसगढ़ आज शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर होता।”

उन्होंने आगे कहा कि शिक्षक संघ का उद्देश्य सरकार की आलोचना करना नहीं है, बल्कि संरचनात्मक सुधार की दिशा में सरकार को सहयोग देना है
उनका मानना है कि छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था में व्यापक परिवर्तन तभी संभव है जब शिक्षा आयोग फिर से सक्रिय हो।


संघ की भूमिका और सक्रियता

छत्तीसगढ़ प्रदेश विद्यालयीन शिक्षक संघ लंबे समय से राज्य में शिक्षक हितों, शिक्षा गुणवत्ता, और नीति निर्माण की दिशा में सक्रिय संगठन रहा है।
संघ के प्रदेश उपाध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद प्रेमी, प्रदेश सचिव अमित कुमार बंजारे, और मीडिया प्रभारी कमल नारायण चौहान के नेतृत्व में संघ ने अनेक बार सरकार को शिक्षक संवर्ग के हित, शैक्षिक प्रशिक्षण सुधार, और शैक्षणिक संसाधन विकास से संबंधित ज्ञापन सौंपे हैं।

संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों —
मुकेश कुमार, लक्ष्मीनारायण बंजारे, राजेश बंजारे, नरेश कुमार सिदार, रोशन कुमार साहू, और गीता सरादे — ने भी इस मांग का समर्थन करते हुए कहा कि शिक्षा आयोग का सक्रिय होना केवल शिक्षकों के लिए ही नहीं बल्कि राज्य के विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के लिए आवश्यक है।


राज्य की शैक्षणिक चुनौतियाँ

प्रेस विज्ञप्ति में यह भी बताया गया कि छत्तीसगढ़ राज्य शिक्षा क्षेत्र में अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है —

  1. ग्रामीण और शहरी शिक्षा के बीच असमानता
  2. शिक्षक प्रशिक्षण की अपर्याप्तता
  3. स्थानीय भाषा आधारित पाठ्य सामग्री की कमी
  4. शैक्षणिक अनुसंधान और नवाचार की गति में ठहराव
  5. स्कूल शिक्षा और उच्च शिक्षा के बीच समन्वय का अभाव

संघ के अनुसार, शिक्षा आयोग इन सभी समस्याओं के समाधान का सशक्त मंच बन सकता है। आयोग यदि सक्रिय होता है, तो राज्य की शिक्षा व्यवस्था नीति-आधारित, शोध-आधारित और शिक्षक-केंद्रित हो सकती है।


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से जुड़ा संदर्भ

संघ ने यह भी उल्लेख किया कि भारत सरकार द्वारा लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) का प्रभावी कार्यान्वयन तभी संभव है जब राज्य स्तर पर शिक्षा आयोग सक्रिय रूप से कार्यरत हो

NEP 2020 में शिक्षक की भूमिका को “राष्ट्र निर्माता” के रूप में परिभाषित किया गया है।
इस नीति के तहत फाउंडेशनल लिटरेसी, मल्टी-डिसिप्लिनरी एजुकेशन, लोकल लैंग्वेज प्रमोशन जैसे तत्व शामिल हैं।
लेकिन आयोग के निष्क्रिय होने से इन लक्ष्यों को छत्तीसगढ़ में लागू करना मुश्किल हो रहा है।

संघ का मानना है कि शिक्षा आयोग के माध्यम से ही

  • राज्य स्तरीय करिकुलम फ्रेमवर्क तैयार होगा,
  • छत्तीसगढ़ी भाषा में शिक्षण संसाधन विकसित होंगे,
  • और शिक्षक प्रशिक्षण के नए मॉडल बनेंगे।

शिक्षा आयोग की अनुपस्थिति का प्रभाव

संघ की रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा आयोग के निष्क्रिय रहने से पिछले वर्षों में —

  • राज्य में शिक्षा नीति से जुड़ी 25 से अधिक योजनाएं ठप पड़ी हैं,
  • शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों का समन्वय कमजोर हुआ है,
  • छात्र मूल्यांकन प्रणाली पुरानी पद्धति पर टिकी है,
  • और पाठ्यक्रम में स्थानीय नवाचार का समावेश नहीं हो पा रहा है।

इस कारण न केवल शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ा है बल्कि
राज्य के ग्रामीण विद्यार्थियों में ड्रॉपआउट रेट भी बढ़ा है।
संघ ने कहा कि यदि शिक्षा आयोग सक्रिय होता, तो राज्य में NEP आधारित सुधारों को तेजी से लागू किया जा सकता था।


संघ का आह्वान — “शिक्षा आयोग राज्य के भविष्य का मार्गदर्शक बने”

संघ ने अपने बयान में कहा कि शिक्षा आयोग केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं बल्कि राज्य की शैक्षणिक दिशा का बौद्धिक केंद्र है।
इस आयोग की निष्क्रियता से न केवल शिक्षक समुदाय बल्कि पूरे समाज को नुकसान हो रहा है।

संघ ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि —

“राज्य में शिक्षा आयोग को पुनः सक्रिय कर छत्तीसगढ़ के भविष्य को सशक्त बनाया जाए।
क्योंकि शिक्षा ही विकास की सबसे बड़ी कुंजी है।”


संघ की आगामी रणनीति

धरमदास बंजारे ने बताया कि यदि राज्य और केंद्र सरकार इस मांग पर शीघ्र कदम नहीं उठाती, तो संघ राज्यभर में
“शिक्षा आयोग पुनर्गठन जागरूकता अभियान” चलाएगा।
इसके अंतर्गत प्रत्येक जिले, ब्लॉक, और पंचायत स्तर पर शिक्षकों एवं अभिभावकों के बीच संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

संघ का उद्देश्य इस आंदोलन को राजनीतिक न बनाकर पूर्णतः शैक्षणिक और सामाजिक दिशा देना है, ताकि यह संदेश जन-जन तक पहुंचे कि शिक्षा आयोग का गठन राज्य के विकास का आधार है।


संघ की एकजुटता और संगठनात्मक क्षमता

संघ के मीडिया प्रभारी कमल नारायण चौहान ने कहा कि

“हमारे संगठन में राज्यभर से हजारों शिक्षक जुड़े हुए हैं।
हमारा लक्ष्य शिक्षक कल्याण के साथ-साथ शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाना है।
यदि आयोग सक्रिय होता है, तो शिक्षक-नीति, पाठ्यचर्या, और प्रशिक्षण के क्षेत्र में बड़ा बदलाव संभव है।”

संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि इस मुद्दे पर राज्य के सभी शिक्षकों में एकजुटता और जागरूकता बढ़ रही है
वे इसे केवल संगठन का नहीं बल्कि प्रदेश के भविष्य का सवाल मानते हैं।


निष्कर्ष — शिक्षा आयोग की पुनर्स्थापना समय की आवश्यकता

छत्तीसगढ़ प्रदेश विद्यालयीन शिक्षक संघ की यह पहल केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि
शिक्षा की गुणवत्ता और नीति सुधार की दिशा में सार्थक प्रयास है।

संघ के पत्र और प्रेस विज्ञप्ति से यह स्पष्ट है कि छत्तीसगढ़ में शिक्षा आयोग की पुनर्स्थापना से —

  • राज्य के शैक्षणिक ढांचे को नई दिशा मिलेगी,
  • शिक्षक सशक्त होंगे,
  • और विद्यार्थियों के लिए स्थानीय संदर्भ में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध होगी।

संघ का यह संदेश पूरे देश के लिए प्रेरणादायक है कि
जब शिक्षक समुदाय जागरूक और एकजुट होता है, तो
नीतिगत बदलाव भी संभव हो जाते हैं।




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