जशपुर का पारंपरिक वाद्य यंत्र : ढोल–नगाड़ा

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 जशपुर का पारंपरिक वाद्य यंत्र : ढोल–नगाड़ा

भूमिका

छत्तीसगढ़ का जशपुर जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जनजातीय संस्कृति और समृद्ध लोकपरंपराओं के लिए जाना जाता है। यहाँ की लोकसंस्कृति में ढोल–नगाड़ा केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना, उत्सव, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक है। इसकी गूंज जशपुर के गाँवों, हाट-बाज़ारों, पर्व–त्योहारों और धार्मिक अनुष्ठानों में जीवन का संचार करती है।

ढोल–नगाड़ा : संरचना और स्वरूप



ढोल और नगाड़ा—दोनों मिलकर एक सशक्त ताल-व्यवस्था बनाते हैं।

ढोल:

बेलनाकार (सिलिंडर) आकृति का वाद्य

लकड़ी के खोखले ढाँचे पर चमड़ा (अक्सर भैंस/बकरी) तना होता है

दोनों ओर अलग-अलग ध्वनियाँ—एक ओर गहरी, दूसरी ओर तीखी

हाथ या लकड़ी की छड़ी से बजाया जाता है

नगाड़ा:

बड़ा, कटोरेनुमा (किटली ड्रम) वाद्य

मोटे चमड़े से ढका हुआ

भारी और गूँजदार स्वर उत्पन्न करता है

प्रायः दो नगाड़े साथ बजते हैं, जिससे ताल में गहराई आती है

इन दोनों की संयुक्त ध्वनि जशपुर की लोकधुनों को पहचान देती है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि

जशपुर अंचल में ढोल–नगाड़ा की परंपरा सदियों पुरानी है। आदिवासी समाज में यह वाद्य संचार का माध्यम भी रहा है—

युद्ध या संकट की सूचना

सामूहिक सभा का आह्वान

उत्सवों की घोषणा

समय के साथ यह वाद्य धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों का अभिन्न अंग बन गया।

धार्मिक एवं सामाजिक महत्व

जशपुर में ढोल–नगाड़ा निम्न अवसरों पर विशेष रूप से बजाया जाता है—

पर्व–त्योहार

करमा, सरहुल, हरियाली, नवाखाई

दीपावली, दशहरा और स्थानीय मेलों में

धार्मिक अनुष्ठान

ग्राम देवताओं की पूजा

देवी–देवताओं की शोभायात्रा

मंदिर उत्सव

विवाह एवं सामाजिक कार्यक्रम

बारात की अगवानी

नृत्य–संगीत के आयोजन

ढोल–नगाड़ा की ताल पर नृत्य करते समुदायजन सामूहिक उल्लास का अनुभव करते हैं।

लोकनृत्य और ढोल–नगाड़ा

जशपुर के प्रमुख लोकनृत्य—करमा, झूमर, पंथी (प्रभाव क्षेत्र में)—इन सबमें ढोल–नगाड़ा की केंद्रीय भूमिका है।

नृत्य की गति और भाव ढोल की ताल से नियंत्रित होते हैं

नगाड़ा नृत्य को शक्ति और उत्साह प्रदान करता है

नर्तक और वादक के बीच अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है

कलाकार और परंपरागत ज्ञान

ढोल–नगाड़ा बजाने की कला पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती है।

अधिकांश वादक पारंपरिक परिवारों से आते हैं

ताल, लय और अवसरानुसार बजाने की शैली मौखिक परंपरा से सीखी जाती है

यह कला आजीविका का साधन भी है

आधुनिक समय में ढोल–नगाड़ा

आज के दौर में भी ढोल–नगाड़ा की प्रासंगिकता बनी हुई है—

सरकारी और गैर-सरकारी सांस्कृतिक कार्यक्रम

पर्यटन महोत्सव

स्कूल, कॉलेज और मंचीय प्रस्तुतियाँ

हालाँकि, आधुनिक वाद्य यंत्रों और डीजे संस्कृति के कारण इसकी चुनौती भी बढ़ी है।

संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता

ढोल–नगाड़ा जशपुर की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत है। इसके संरक्षण के लिए—

लोक कलाकारों को प्रोत्साहन

प्रशिक्षण शिविर और कार्यशालाएँ

विद्यालय स्तर पर लोकसंस्कृति से परिचय

दस्तावेज़ीकरण और शोध

अत्यंत आवश्यक हैं।

निष्कर्ष

ढोल–नगाड़ा जशपुर की आत्मा की धड़कन है। इसकी गूंज में इतिहास, परंपरा और सामूहिक जीवन की अनुभूति समाहित है। यह वाद्य यंत्र केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जशपुर की सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता का सशक्त प्रतीक है। जब तक ढोल–नगाड़ा की ताल गूंजती रहेगी, तब तक जशपुर की लोकसंस्कृति जीवंत बनी रहेगी।

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