“भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं, भविष्य की भी दिशा ”
कांसाबेल महाविद्यालय में रूसा प्रायोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न, देश के विभिन्न राज्यों से 263 प्रतिभागी जुड़े
जशपुर। नवीन शासकीय महाविद्यालय कांसाबेल, जिला जशपुर (छत्तीसगढ़) में रूसा (RUSA) द्वारा प्रायोजित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी का विषय “भारतीय ज्ञान परंपरा : कल, आज और कल” रखा गया, जिसमें भारतीय ज्ञान की समृद्ध परंपरा, उसके ऐतिहासिक स्वरूप, वर्तमान प्रासंगिकता तथा भविष्य की संभावनाओं पर व्यापक विमर्श किया गया। इस अकादमिक आयोजन में देश के विभिन्न राज्यों से जुड़े प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक, शोधार्थी तथा विद्यार्थियों ने भाग लिया। ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से कुल 263 प्रतिभागियों ने संगोष्ठी में अपनी सहभागिता दर्ज कराई, जिनमें 75 से अधिक शोधार्थी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री सालिक साय, जिला पंचायत जशपुर रहे। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और विश्व को दिशा देने वाली रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने जीवन के विभिन्न आयामों—दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा, समाज और संस्कृति—पर गहन अध्ययन कर जो ज्ञान दिया है, वह आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शक है। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं है बल्कि यह हमारे जीवन-मूल्यों, व्यवहार और सामाजिक व्यवस्था में भी परिलक्षित होती है। उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे भारतीय संस्कृति और ज्ञान परंपरा को समझें, उसका अध्ययन करें और उसे आधुनिक संदर्भों से जोड़कर समाज के विकास में योगदान दें।
संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ. गोवर्धन व्यास, शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ महाविद्यालय रायपुर, ने अपने व्याख्यान में भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक आयामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा भी है। वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, गणित, खगोल विज्ञान और योग जैसी प्राचीन ज्ञान प्रणालियाँ आज भी विश्व में अध्ययन और अनुसंधान का महत्वपूर्ण विषय बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन परंपराओं का आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन किया जाए तो यह मानव समाज के समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
डॉ. व्यास ने यह भी कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा में केवल आध्यात्मिकता ही नहीं बल्कि जीवन के व्यावहारिक पक्षों से जुड़ा गहन वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी मिलता है। आयुर्वेद और योग जैसी पद्धतियाँ आज वैश्विक स्तर पर स्वीकार की जा रही हैं। इसी प्रकार भारतीय गणित और खगोल विज्ञान ने विश्व विज्ञान को नई दिशा दी है। उनके विचारों को उपस्थित प्राध्यापकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने अत्यंत ध्यानपूर्वक सुना और सराहा।
संगोष्ठी में कई विशिष्ट वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। प्रो. रविन्द्र ब्राह्मे (पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय रायपुर) ने भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके दार्शनिक आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं बल्कि मनुष्य को जीवन के उच्चतम मूल्यों तक पहुँचाना है।
डॉ. रामानुज प्रताप ध्रुव (शासकीय महाविद्यालय कुनकुरी) ने अपने व्याख्यान में लोक संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा के परस्पर संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत के लोक जीवन में भी ज्ञान की समृद्ध परंपरा विद्यमान है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ती रही है।
डॉ. शशि मार्कण्डेय (शासकीय महाविद्यालय पत्थलगांव) ने भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा के संबंधों पर विचार रखते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान प्रणाली को महत्व दिया गया है, जिससे विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर मिलेगा।
डॉ. अमरेन्द्र सिंह, प्राचार्य, शासकीय एन.ई.एस. महाविद्यालय जशपुर ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित नैतिक मूल्य और जीवन दृष्टि आज के समाज में अत्यंत प्रासंगिक हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक का निर्माण करना भी है।
इसके अलावा डॉ. किशोर मिंज (कुनकुरी) ने भारतीय ज्ञान परंपरा के सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए और कहा कि भारतीय समाज की विविधता में एकता का आधार भी इसी ज्ञान परंपरा में निहित है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. कुसुम माधुरी टोप्पो ने की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा हमारे देश की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की संगोष्ठियाँ विद्यार्थियों और शोधार्थियों को ज्ञान के नए आयामों से परिचित कराने का अवसर प्रदान करती हैं। उन्होंने सभी अतिथियों, वक्ताओं और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन और अनुसंधान के लिए प्रेरित किया।
संगोष्ठी में मनोरा महाविद्यालय के प्राचार्य श्री एस. पी. भगत भी उपस्थित रहे। उन्होंने अपने विचार रखते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल इतिहास का विषय नहीं है बल्कि यह आज भी हमारे समाज और शिक्षा व्यवस्था के लिए प्रेरणास्रोत है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के अकादमिक आयोजन विभिन्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के बीच ज्ञान के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण माध्यम बनते हैं।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में बागबहार महाविद्यालय, कुनकुरी महाविद्यालय तथा सरगुजा विश्वविद्यालय से जुड़े शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने भी सक्रिय भागीदारी निभाई। संगोष्ठी के दौरान विभिन्न विषयों पर शोधार्थियों द्वारा अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए गए।
हिंदी विषय से शोधार्थी मुकेश कुमार, अंजना कुजूर, नंजू कुमारी और नमिता तिर्की ने भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। उनके शोध पत्रों में भारतीय संस्कृति, भाषा और लोक परंपराओं के महत्व को रेखांकित किया गया। वहीं समाजशास्त्र विषय से शालिनी गुप्ता ने अपने शोध पत्र में समाज और संस्कृति के संबंधों तथा भारतीय ज्ञान परंपरा के सामाजिक प्रभावों का विश्लेषण प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी की एक विशेषता यह रही कि इसमें देश के विभिन्न राज्यों से बड़ी संख्या में प्रतिभागी ऑनलाइन माध्यम से भी जुड़े। लगभग 75 से अधिक शोधार्थियों ने ऑनलाइन सहभागिता करते हुए अपने विचार साझा किए। ऑफलाइन प्रतिभागियों के साथ मिलाकर कुल 263 प्राध्यापक, सहायक प्राध्यापक, शोधार्थी और छात्र-छात्राएँ इस राष्ट्रीय संगोष्ठी से जुड़े। इस प्रकार यह कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञान और विचारों के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण मंच बना।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागियों के बीच भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर सार्थक चर्चा और संवाद हुआ। संगोष्ठी का उद्देश्य केवल अकादमिक चर्चा तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका लक्ष्य भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को समझना और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाना भी था।
अंत में आयोजन समिति द्वारा सभी अतिथियों, वक्ताओं, शोधार्थियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। संगोष्ठी का सफल आयोजन महाविद्यालय के प्राध्यापकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के सहयोग से संभव हुआ। यह राष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्ध विरासत को समझने और उसे आधुनिक शिक्षा तथा शोध के साथ जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध हुई।





